Author: Chandrakala Bangur (My mom)
मां एक प्यार है एक एहसास है श्रद्धा आदर और विश्वास है
मां बोलती ना थी पहचानती ना थी समझती न थी
फिर भी एक एहसास है
घर आने का कारण मां को देखे बहुत हो गए दिन
मिलने का करता है मन
ज्यों ही घर आते
कदम मां के कमरे में दौड़ पड़ते मां क्या कर रही हो,
उसको प्रणाम करते
खुली आंखों से ही हाल-चाल जान लेती
मूक होठों से ही आशीष की झड़ी लगा देती
हम सब तेरा दुख समझते थे, तेरी परेशानी से अंजान ना थे कहां जाऊं किसे पूछूं
मां कैसी है
तू जहां भी रहे हमारी अपनी रहना
तेरा प्यार कम ना हो पाए हम बच्चों पर
ऐसे ही प्यार आशीष लुटाती रहना
केवल पिता से होगा तेरा सुखद मिलन
तेरे संग वहीं से प्यार आशीष लुटाएंगे कंचन और गगन
ऐसे मात पिता को कोटि-कोटि पूजन अर्चन शत-शत नमन शत-शत वंदन ।
– चंद्रकला बांगड़
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